उज्जैन के महाकाल मंदिर क्षेत्र में 27 सितंबर 2024 को भारी बारिश के दौरान महाराजवाड़ा स्कूल की दीवार गिरने से दो लोगों की मौत हुई थी। हादसे के बाद प्रशासन ने जिम्मेदारी तय करने की दिशा में तत्काल कदम उठाया। पांच कर्मचारियों को निलंबित किया गया, जिनमें दो पुलिसकर्मी, नगर निगम के दो कर्मचारी और मंदिर सुरक्षा से जुड़ा एक कर्मचारी शामिल था। प्रशासन ने प्रथम दृष्टया लापरवाही मानते हुए कार्रवाई की और आगे की जांच के आधार पर अतिरिक्त कार्रवाई की बात कही थी। अब सवाल आगर-मालवा के नलखेड़ा का है।मां बगलामुखी मंदिर के पास बारिश से उफने बरसाती नाले में एक कार बह गई। कार में सवार आठ लोगों की मौत हो गई। इनमें ओडिशा के एक परिवार के सात सदस्य शामिल थे, जिनमें तीन बच्चे भी थे। आठवां मृतक कार चालक था। परिवार धार्मिक यात्रा पर मध्यप्रदेश आया था और दर्शन के बाद लौट रहा था। यह केवल एक सड़क हादसा मानकर आगे बढ़ जाने का मामला नहीं है। असली सवाल उस व्यवस्था का है, जो बरसात के दिनों में ऐसे स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होती है।क्या वहां पर्याप्त चेतावनी व्यवस्था थी?क्या तेज बारिश के दौरान मार्ग को सुरक्षित तरीके से बंद करने की व्यवस्था थी?क्या पुलिया और नाले के जोखिम का पहले से आकलन किया गया था?क्या वहां सुरक्षा बैरिकेड, संकेतक या वैकल्पिक मार्ग की प्रभावी व्यवस्था थी?और सबसे बड़ा सवाल—यदि व्यवस्था में कमी थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी?इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आएगा। लेकिन जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है।महाकाल क्षेत्र की घटना में दो मौतों के बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया में निलंबन जैसी कार्रवाई सामने आई थी। नलखेड़ा में आठ लोगों की मौत के बाद भी, कम से कम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर, अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई सामने नहीं आई है। प्रशासन और पुलिस ने राहत-बचाव अभियान चलाया और जांच की प्रक्रिया शुरू हुई, जबकि मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये की सहायता की घोषणा की। प्रधानमंत्री राहत कोष से भी प्रत्येक मृतक के परिवार के लिए दो लाख रुपये की सहायता घोषित की गई। लेकिन मुआवजा जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।आठ परिवारों की जिंदगी उजड़ गई। सात मृतक दूसरे राज्य के नागरिक थे, जो मध्यप्रदेश में आस्था के केंद्र पर आए थे। उनके परिवारों ने अपने लोगों को खोया है। ऐसे में यह सवाल केवल आगर-मालवा का नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश में आने वाले हर श्रद्धालु और पर्यटक की सुरक्षा से जुड़ा है।ओडिशा से आए इन लोगों के जीवन का मूल्य किसी भी मध्यप्रदेशवासी के जीवन से कम नहीं है। राज्य की सीमा बदल जाने से नागरिक के जीवन का मूल्य नहीं बदलता। मध्यप्रदेश आने वाला हर व्यक्ति यहां की व्यवस्था पर भरोसा करके आता है और उस भरोसे की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की भी होती है।इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हादसे के बाद कितनी आर्थिक सहायता दी गई। सवाल यह भी होना चाहिए कि हादसा क्यों हुआ, उसे रोका जा सकता था या नहीं और यदि लापरवाही हुई तो जिम्मेदार कौन है?जांच निष्पक्ष हो, तथ्यों के आधार पर हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो—यही उन आठ मौतों के बाद उठ रहे सवालों का सबसे जरूरी जवाब होगा। क्योंकि आठ मौतों के बाद सिर्फ शोक संदेश और मुआवजे का मरहम काफी नहीं हैं।
अब जवाबदेही भी दिखाई देनी चाहिए।

