दर्शन कर लौट रहे श्रद्धालुओं की कार बरसाती नाले में गिरी; टूटी रेलिंग वाली पुलिया पर न बैरिकेडिंग, न चेतावनी संकेतक, वैकल्पिक मार्ग की जानकारी भी नदारद
आगर- मां बगलामुखी मंदिर में दर्शन कर लौट रहे 8 श्रद्धालुओं की कार सहित बरसाती नाले में डूबने से मौत ने मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतकों में ओडिशा के 7 श्रद्धालु और वाहन चालक शामिल हैं। हादसा शनिवार देर रात हुआ, जबकि इसकी जानकारी सुबह सामने आई। मंदिर के मुख्य द्वार से महज 60 फीट दूर हुई इस घटना के बाद सवाल उठ रहे हैं कि जब पुलिया पर करीब 4 फीट पानी था, तब वहां न पुलिस जवान तैनात था और न ही बैरिकेड्स लगाए गए थे। पुलिया की रेलिंग पर लगे एंगल टूटे हुए हैं। आने-जाने वाले मार्ग पर चेतावनी संकेतक और वैकल्पिक मार्ग की दिशा बताने वाले बोर्ड भी नहीं हैं।
पुलिया पर पानी, लेकिन सुरक्षा के इंतजाम नदारद
शुक्रवार और शनिवार की दरम्यानी रात नलखेड़ा में जोरदार बारिश हुई थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पुलिया पर करीब 4 फीट पानी था। बारिश के दौरान इस पुलिया के डूबने की समस्या पहले से ही सामने आती रही है। कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीना ने भी बारिश से पहले नदी-नालों पर सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त रखने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद हादसे के समय पुलिया पर न तो पुलिसकर्मी मौजूद था और न ही बैरिकेडिंग की गई थी।
पुलिया पर आने-जाने वाले मार्ग पर खतरे की चेतावनी देने वाले संकेतक नहीं हैं। वैकल्पिक मार्ग मौजूद होने के बावजूद उसकी दिशा बताने वाले बोर्ड भी नहीं लगाए गए हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को स्थानीय रास्तों की जानकारी नहीं होती। ऐसे में पानी से भरी पुलिया के सामने वाहन चालकों को रोकने और सुरक्षित रास्ते की जानकारी देने की व्यवस्था होना जरूरी था।
सवाल यह है कि जब प्रशासन को पता था कि बारिश में पुलिया डूब जाती है, तो वहां यातायात रोकने के इंतजाम क्यों नहीं किए गए? क्या नदी-नालों की सुरक्षा के निर्देश केवल कागजों तक सीमित रह गए? मौके पर निर्देशों की पालना सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
2016 में भी इसी नाले में गिरी थी कार, फिर क्यों नहीं सुधरी व्यवस्था?
इस पुलिया पर हादसे का खतरा वर्षों से बना हुआ है। वर्ष 2016 में भी इसी नाले में एक कार गिर गई थी। उस समय तत्काल रेस्क्यू कर उसमें सवार करीब 3 लोगों को बचा लिया गया था। घटना के बाद से ही स्थानीय लोग पुलिया को चौड़ा करने और ऊंचा उठाने की मांग करते रहे हैं। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।

बारिश में बार-बार डूबने वाले मार्ग पर मजबूत रेलिंग, चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और वैकल्पिक मार्ग के संकेतक लगाने की जरूरत स्पष्ट थी। फिर भी इन बुनियादी इंतजामों का अभाव बना रहा। सवाल है कि पहले की घटना के बाद जोखिम का आकलन क्यों नहीं किया गया और पुलिया की समस्या को दूर करने के लिए क्या कार्रवाई हुई?
कलेक्टर के आदेश के बाद हटे बैरिकेड्स, नए भी नहीं लगे
मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक आदेशों के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं। गत 18 अगस्त को कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीना ने आदेश जारी कर मंदिर समिति को अपने बैरिकेड्स बनवाने और पीडब्ल्यूडी के बैरिकेड्स वापस करने के निर्देश दिए थे। जानकारी के मुताबिक, मंदिर समिति ने अपने बैरिकेड्स नहीं बनवाए, जबकि पीडब्ल्यूडी के बैरिकेड्स हटा लिए गए।

ऐसे में सवाल उठता है कि पुराने बैरिकेड्स हटाने से पहले नए बैरिकेड्स की व्यवस्था सुनिश्चित क्यों नहीं की गई? क्या आदेश के बाद उसकी पालना की समीक्षा हुई? यदि नहीं, तो सुरक्षा व्यवस्था में बनी इस कमी की जिम्मेदारी किसकी है?
एक व्यवस्था हटाने के बाद दूसरी व्यवस्था लागू नहीं करना प्रशासनिक समन्वय पर सवाल खड़े करता है। इस पूरे मामले में आदेश जारी करने से लेकर उसके पालन और मौके पर सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी तक की जांच जरूरी है।
पार्किंग शुल्क वसूली, लेकिन कीचड़ और शौचालयों की समस्या
मंदिर परिसर में बड़ी पार्किंग होने के बावजूद बारिश के दौरान वहां कीचड़ की समस्या बनी रहती है। चार पहिया वाहनों से 20 रुपए शुल्क लिया जाता है और पार्किंग में बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है। शौचालयों की व्यवस्था को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं।
मंदिर समिति के पास करोड़ों रुपए का दान जमा होने की बात कही जाती है। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वच्छता, पार्किंग और अन्य सुविधाओं पर खर्च का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। दान की राशि का उपयोग किस तरह किया जा रहा है और श्रद्धालुओं को उसके अनुरूप सुविधाएं क्यों नहीं मिल रही हैं, इसकी समीक्षा जरूरी है।
वीआईपी मूवमेंट में सक्रियता, आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर सवाल
विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर में सालभर वीआईपी मूवमेंट रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवारजनों सहित देश के कई बड़े नेता, मुख्यमंत्री, अभिनेता और उद्योगपति यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। वीकेंड और नवरात्रि में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
वीआईपी दौरे के दौरान अधिकारियों, पुलिस और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए स्थायी इंतजाम क्यों नहीं हो पाए? मंदिर के मुख्य द्वार के पास स्थित पुलिया पर खतरे के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था का अभाव इसी सवाल को और गंभीर बनाता है।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा केवल वीआईपी दौरे के समय की व्यवस्था नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं। उन्हें स्थानीय रास्तों और बरसाती नालों की स्थिति की जानकारी होना जरूरी नहीं है। ऐसे में सुरक्षित आवागमन, जोखिम वाले स्थानों की पहचान और आपातकालीन सहायता प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
मंदिर समिति की व्यवस्थाएं भी लगातार सवालों में
मां बगलामुखी मंदिर की व्यवस्थाएं पहले भी विवादों में रही हैं। हाल ही में शासकीय प्रबंध समिति के समानांतर अन्य समिति द्वारा श्रद्धालुओं से सोना, चांदी और नकदी के रूप में दान लेने को लेकर विवाद सामने आया था। मंदिर के पंजीकृत और अपंजीकृत पंडितों को लेकर भी विवाद होते रहे हैं। हवन की राशि को लेकर पंडितों और प्रशासन के बीच कई बार टकराव की स्थिति बनी है।
स्थानीय श्रद्धालु विपिन पाटनी, पंकज सोनी, मनीष जैन, सीताराम पाटीदार और मंदिर के आसपास दुकान लगाने वाली महिलाओं सहित कई लोगों ने हादसे के बाद प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या और ख्याति के अनुरूप सुरक्षा एवं सुविधाओं के इंतजाम नहीं हैं।
अब जांच के साथ जवाबदेही भी तय करना जरूरी
आठ लोगों की मौत के बाद प्रशासन के सामने कई सवाल हैं। बारिश से पहले नदी-नालों की सुरक्षा के निर्देशों का पालन किस स्तर पर हुआ? पुलिया पर पानी होने के बावजूद बैरिकेड्स क्यों नहीं लगे? चेतावनी और वैकल्पिक मार्ग के संकेतक क्यों नहीं थे? हादसे के समय सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसके पास थी? वर्ष 2016 की घटना के बाद पुलिया को ऊंचा उठाने और चौड़ा करने की मांग पर क्या कार्रवाई हुई?
इन सवालों के जवाब केवल औपचारिक जांच से नहीं, बल्कि स्पष्ट तथ्य और जिम्मेदारी तय करने वाली कार्रवाई से सामने आने चाहिए। मंदिर समिति की सुविधाओं, सुरक्षा खर्च और प्रशासनिक निगरानी की भी समीक्षा होनी चाहिए।
आठ लोगों की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस खतरे की जानकारी वर्षों से थी, उसे रोकने के लिए जरूरी इंतजाम आखिर क्यों नहीं किए गए? यदि पुलिया पर बैरिकेड्स, चेतावनी संकेतक, वैकल्पिक मार्ग के बोर्ड और पुलिस की तैनाती होती, तो संभव है कि श्रद्धालुओं की कार उस रास्ते पर आगे नहीं बढ़ती। अब जरूरी है कि हादसे के कारणों के साथ-साथ उन व्यवस्थागत कमियों की भी जांच हो, जिनका समय रहते समाधान किया जा सकता था।

